“यह हुसैन का हिंदुस्तान है” — हरिद्वार में जश्न-ए-इमाम हुसैन संगोष्ठी से एकता, इंसाफ़ और इंसानियत का बुलंद पैग़ाम
मंगलौर के हेवन्स पैलेस में आयोजित स्वर्ण जयंती संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में राष्ट्रीय विचारकों, शिक्षाविदों और धर्मगुरुओं ने कहा—कर्बला का संदेश आज के भारत के लिए सबसे अधिक प्रासंगिक
हरिद्वार जनपद के मंगलौर स्थित हेवन्स पैलेस में जश्न-ए-इमाम हुसैन (अ.स.) स्वर्ण जयंती संगोष्ठी का द्वितीय सत्र अत्यंत गरिमामय, वैचारिक और प्रेरक वातावरण में संपन्न हुआ। सत्र की निज़ामत नजीब इलाहाबादी साहब ने की। कार्यक्रम में देश के प्रतिष्ठित वक्ताओं, राष्ट्रीय विचारकों, शिक्षाविदों और धर्मगुरुओं ने कर्बला के सार्वभौमिक संदेश—सत्य, न्याय, बलिदान, एकता और इंसानियत—पर अपने विचार रखते हुए इसे समकालीन भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता बताया।

मुख्य वक्ता डॉ. इंद्रेश कुमार, मार्गदर्शक, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच एवं राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कहा कि उन्होंने देश-विदेश के अनेक मंचों पर इमाम हुसैन और हुसैनियत के संदेश को प्रस्तुत किया है। दिल्ली में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन भाषण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा,“उर्दू बेघर नहीं है। उर्दू का घर हिंदुस्तान है और यह सदैव रहेगा। अगर उर्दू भारत की ज़ुबान नहीं होती, तो हिंदुस्तान की करेंसी पर उर्दू में लिखा हुआ कभी दिखाई न देता।” उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि उर्दू भारत की ज़ुबान थी, है और हमेशा रहेगी। अल्पसंख्यक शब्द की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा,
“आप माइनॉरिटी के नाम से आए हैं, लेकिन न आप विदेशी हैं, न ग़ैर, न किरायेदार—आप इस धरती के असली वारिस हैं।”
हाजी शब्द के अर्थ को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि हाजी बनना केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि अपने भीतर की बुराइयों को समाप्त कर एक सच्चा, ईमानदार और समाज के हित में कार्य करने वाला इंसान बनना है। उन्होंने कहा,“यह हुसैन का हिंदुस्तान है। सदियों पहले इमाम हुसैन की कुर्बानी ने इस देश को नैतिक दिशा और पहचान दी—यही भारत की आत्मा है।”
प्रो. शाहिद अख़्तर, कार्यवाहक अध्यक्ष, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग (NCMEI), भारत सरकार ने कहा कि इमाम हुसैन का संदेश किसी एक दौर या समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पूरी इंसानियत की आवाज़ है। उन्होंने कहा, “कर्बला हमें सिखाता है कि जीत ताक़त से नहीं, बल्कि हक़, सब्र और चरित्र से हासिल होती है। यज़ीद सत्ता पाकर भी हार गया, जबकि इमाम हुसैन कुर्बानी देकर भी हमेशा के लिए जीत गए।” उन्होंने संगोष्ठी में प्रस्तुत विचारों और शोध-पत्रों को संकलित कर भावी पीढ़ियों तक पहुँचाने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया।
कर्नल ताहिर मुस्तफा, रजिस्ट्रार, जामिया हमदर्द विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने कहा कि इमाम हुसैन की कुर्बानी हक़, इंसाफ़ और इंसानियत की अमर मिसाल है। उन्होंने कहा, “जो हक़ के लिए कुर्बान होता है, वह कभी मरता नहीं—उसकी आवाज़ सदियों तक गूंजती रहती है।”
उन्होंने यह भी कहा कि हर धर्म इंसानियत, मोहब्बत और न्याय का पैग़ाम देता है और भारत की वास्तविक ताक़त आपसी संवाद, बराबरी और सम्मान में निहित है।
डॉ. इमरान चौधरी, स्कॉलर ने कहा,
“इमाम हुसैन (अ.स.) का पैग़ाम सिर्फ़ इतिहास नहीं, बल्कि आज की ज़रूरत है। कुर्बानी का अर्थ रस्म नहीं, बल्कि ज़ुल्म के ख़िलाफ़ डटकर खड़ा होना है।” उन्होंने कहा कि हुसैनियत को केवल ज़ुबान से नहीं, बल्कि अमल से ज़िंदा करना होगा और बच्चों को अच्छी तालीम व सही दिशा देना ही सच्ची कुर्बानी है।
मौलाना कोकब मुस्तफा, वरिष्ठ इस्लामिक विद्वान ने कहा कि कर्बला किसी एक समुदाय की विरासत नहीं, बल्कि पूरी मानवता की धरोहर है और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना ही सच्ची इबादत है।
सत्र के समापन अवसर पर आयोजक सैयद अली हैदर ज़ैदी ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, श्रोताओं और मीडिया प्रतिनिधियों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम शांति, भाईचारे, संवैधानिक मूल्यों और नैतिक साहस को मज़बूत करने की दिशा में एक प्रभावशाली और प्रेरक पहल के रूप में संपन्न हुआ।
ईश्वर चंद संवाददाता सहारा टीवी
